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आरक्षण और लोहिया का समाजवाद

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आरक्षण और लोहिया का समाजवाद

Post by KULDEEP BIRWAL on Sat Oct 27, 2012 11:21 am

अरुण कुमार त्रिपाठी
जनसत्ता 11 सितंबर, 2012: उस दिन एक चैनल पर समाजवादी पार्टी के प्रादेशिक प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी को तरक्की में आरक्षण के बरक्स बहस करते देख कर अच्छा लगा और चिंता भी हुई। अच्छा इसलिए क्योंकि उन्होंने इस बात को महसूस किया कि देश के लाखों गरीबों का भला नौकरी और फिर उसमें तरक्की में आरक्षण पाने से नहीं होने वाला है। उन्हें और कुछ चाहिए और वह इस तरह के प्रतीकात्मक कदमों से नहीं मिलेगा। उलटे इससे सामाजिक समरसता टूटेगी। लेकिन चिंता यह हुई कि उन्होंने इस बात का जवाब नहीं दिया कि क्या उनकी पार्टी भी पदोन्नति में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिलाना चाहती है? क्या वह विरोध इसलिए कर रही है कि वैसा नहीं हो पा रहा है?
लेकिन उससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि एक नामी चैनल के लोकप्रिय एंकर उनकी उस भावना का मजाक उड़ा रहे थे जो वे आरक्षण और समाज की वर्गीय स्थिति के बारे में व्यक्त कर रहे थे। चैनल पर बैठे दो अन्य विशेषज्ञों की तरफ संबोधित करके वे कह रहे थे कि ये लोग तो साहब बन गए पर उन्होंने उन लोगों की चिंता छोड़ दी जिनके पिछड़ेपन को दूर करने के लिए उन्हें विशेष अवसर का लाभ मिला था। उससे भी रोचक बात यह है कि यह विमर्श राममनोहर लोहिया के समाजवादी दर्शन के दायरे में चल रहा था।
सरकारी नौकरियों में आरक्षण के माध्यम से चुने जाने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के साथ वहां भी अन्याय होता है और उन्हें समय पर तरक्की नहीं मिलती। वे ऊंचे पदों पर नहीं पहुंच पाते और सरकारी नीतियों पर वह असर नहीं डाल पाते जो वे अपने तबके के हितों के लिए डालना चाहते हैं। इस बारे में पर्याप्त आंकड़े हैं और अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग के पास शिकायतें भी हैं। लेकिन इन चर्चाओं में यह पूछने वाला कोई नहीं था कि क्या आरक्षण पर नए-नए गणितीय घात लगाने से वह सही मायने में असरदार हो जाएगा? अगर वह अपने पहले चरण में प्रभावशाली नहीं है तो अगले चरण में कैसे हो जाएगा? क्या कोई दवा कारगर न होने पर उसकी पोटैंसी बढ़ाने से असर आ जाएगा? सवाल यह भी है कि सर्वोच्च पदों पर पहुंचने की यह लड़ाई क्या समाज के पिछड़े और दलित वर्गों के लिए जनवादी और कल्याणकारी नीतियां बनाने और उन्हें लागू करने के लिए है या महज सर्वोच्च पद पर पहुंचने की निजी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए?
आखिर जो नौकरशाही अपने सहयोगी के साथ तरक्की में इंसाफ नहीं कर रही है वह जनता के साथ कैसे निष्पक्ष और सम्मानजनक आचरण करेगी? लेकिन सामाजिक न्याय के नए पैरोकार बने हमारे चैनलों के एंकरों को सरकारी और निजी नौकरशाही के चरित्र पर सवाल उठाने की फुरसत कहां!
इस देश में नौकरशाही भगवान की तरह पूजी जाती है और हमारे बीच के तमाम पत्रकार मित्र उसी सपने के अधूरे रह जाने पर पत्रकारिता का रास्ता अपनाते हैं। इसलिए नौकरशाही के बुनियादी चरित्र पर सवाल उठाते समय उनके कार्यक्रम में कॉमर्शियल ब्रेक आने लगता है।
अस्सी के दशक में आई गोविंद निहलानी की फिल्म ‘आक्रोश’ में अमरीश पुरी ने लोक अभियोजक की भूमिका निभाई है। वह स्वयं आदिवासी समुदाय से आता है लेकिन वह किसी भी आदिवासी का पक्ष लेने के बजाय ठेकेदार, अफसर और नेता से अपनी एक तिकड़ी बना लेता है। आदिवासियों को जगाने में लगा नसीरुद््दीन शाह जब फिल्म के मूक नायक ओम पुरी का दर्द बयान करते हुए उससे मदद की अपेक्षा करता है तो वह कहता है कि मैं जानता हूं, ये आदिवासी होते ही ऐसे हैं।
कल्पना कीजिए, जब अस्सी के दशक में उपभोक्तावाद कमजोर होने पर वैसी स्थिति थी तो आज समाज के घोर भौतिकवादी और व्यक्तिवादी बनने के बाद वह कैसी हो गई होगी? राजेंद्र चौधरी हमारी नौकरशाही की इसी मानसिकता की तरफ संकेत कर रहे थे जो सत्ता मिलने के बाद सत्ता के शोषक चरित्र और साजिश में शामिल हो जाती है। शायद वे यह कहना चाह रहे हों कि नौकरशाही में आरक्षण तो है ही, चुनौती उसके चरित्र को जनवादी और संवेदनशील बनाने की है। पर सवाल उससे भी बड़ा है। सवाल यह है कि वह एक निष्पक्ष उपकरण के तौर पर कैसे काम करे।
लेकिन उससे भी महत्त्वपूर्ण सवाल सामाजिक बदलाव के औजार के तौर पर आरक्षण के असर और लोहिया के समाजवादी सपने का है। लोहिया एक ऐसे समाजवादी नेता के तौर पर जाने जाते हैं जिन्होंने यूरोप की इस विचारधारा की भारतीय संदर्भों में व्याख्या की।
यह व्याख्या इतनी मौलिक थी कि इसके लिए उन्होंने साम्यवादियों को सैद्धांतिक तौर पर गलत सिद्ध किया और उनसे दुश्मनी की हद तक गए। लोहिया का ‘इकोनॉमिक्स आफ्टर मार्क्स’ जैसा व्यवस्थित तौर पर लिखा गया लेख, जिसे बहुत कम समाजवादियों ने पढ़ा होगा, इस बात की स्पष्ट व्याख्या करता



है कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अंतिम अवस्था नहीं है। वह तो पूंजीवाद का जुड़वां है जो उसी के साथ जन्म लेता है और उसके बिना पूंजीवाद सफल नहीं हो सकता। यही वजह है कि वे जहां देशी पूंजीवाद से लड़ कर किसानों और मजदूरों के शोषण का अंत चाहते थे वहीं यूरोपीय साम्राज्यवाद से पूरी दुनिया में एक तरह की लड़ाई भी।
भारत के जातिवाद से लड़ते हुए लोहिया न तो वर्ग संघर्ष की जरूरत को भूले थे न ही साम्राज्यवाद से होने वाली लड़ाई को। उन्हें यूरोपीय गुलामी के साथ देशी गुलामी को भी मिटाने की चिंता थी। लेकिन इसी के साथ स्त्री की गुलामी के प्रति भी वे जागरूक थे। यही वजह है उन्होंने जाति और योनि के कठघरे जैसा मशहूर भाषण दिया था और भारत के समाजवादियों और क्रांतिकारियों से इसे तोड़ने की अपील की थी। तमाम समाजवादी जब लोहिया के उस नारे को दोहराते हैं कि ‘सोशलिस्टों ने बांधी गांठ पिछड़ा पावे सौ में साठ’ तब वे यह भूल जाते हैं कि लोहिया की सप्तक्रांति का पहला सूत्र नर-नारी समता का था। राममनोहर लोहिया का नाम लेने वालों ने उनके चिंतन को महज आरक्षण और बाद में पिछड़ावाद तक लाकर सीमित कर दिया है।
यह जान-बूझ कर हुआ या अनजाने में, यह लंबी चर्चा का विषय है। पर यह उन तमाम लोगों की क्षमता का भी सवाल हो सकता है जो कभी लोहिया के साथ किसी संघर्ष के हिस्से थे और आज उनकी विरासत का दावा कर रहे हैं। लोहिया मानव मुक्ति के अनन्य योद्धा और विचारक थे।
वे जाति और योनि की गुलामी के साथ एशिया और अफ्रीका की गुलामी को लेकर भी चिंतित थे। यही वजह है कि वे जाति-व्यवस्था के साथ-साथ पूंजीवाद को भी मिटाना चाहते थे और साम्यवाद में भी मानव की मुक्ति नहीं देख पाते थे। उनका मानना था कि भारत गुलाम हुआ ही इस कारण, क्योंकि यहां जाति और योनि के आधार पर भेदभाव था। अगर हम इस भेदभाव को मिटा लें तो अपनी गुलामी को दूर कर सकते हैं और भविष्य में आने वाली किसी गुलामी का भी मुकाबला कर सकते हैं।
वे लोग लोहिया के साथ अन्याय करते हैं जो आरक्षण की अवधि या प्रतिशत बढ़ाने के लिए उनका नाम तो लेते हैं लेकिन आर्थिक असमानता पैदा करने वाली पूंजीवादी नीतियों को लागू करते समय उन्हें भूल जाते हैं। लोहिया समाजवाद के लिए महात्मा गांंधी से भी असहमत होने को तैयार थे जबकि उन्होंने हर कदम पर उनका अनुसरण किया। दो व्यक्तियों की आय में एक और दस से ज्यादा का अंतर न होने और निजी संपत्ति पर कम से कम जोर न देने की उनकी अवधारणा उस स्वरूप की रचना करती है जहां भारत जैसे विविधता वाले देश में वर्ग की खाइयों को कम किया जा सकता है।
यह सही है कि आरक्षण सामाजिक भेदभाव को मिटाने के लिए एक सकारात्मक भेदभाव के तौर पर है लेकिन समता लाने का वही एक पर्याप्त औजार नहीं है। उसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था को चुनौती देनी ही होगी, जिसके लिए लोहिया समर्पित थे। अगर हम लोहिया को महज आरक्षण पाने के लिए उद्धृत करते हैं और पूंजीवादी असमानता मिटाने के उनके आह्वान को भूल जाते हैं तो उनके साथ अन्याय करते हैं।
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी एक तरफ देश में असमानता बढ़ाने वाली उदारीकरण की नीतियों पर चलती हैं तो दूसरी तरफ आरक्षण पर थोड़ा-बहुत दिखावा करके समानता लाने का पाखंड करती हैं। बहुजन समाज पार्टी और दूसरी पार्टियां भी उस भूमिका को ज्यादा आक्रामक तरीके से निभाती रही हैं। तमाम पिछड़े-दलित ही नहीं, सवर्ण बौद्धिकों का भी यही चरित्र है। पूंजीवादी नीतियों पर चलते हुए समता का तमगा लटकाने का यह पाखंडी अवसर भारत की जाति-व्यवस्था ने हमारे राजनीतिक दलों को खुल कर दिया है। इस पाखंड को कभी उजागर करने वाली वामपंथी पार्टियां भी अब खामोश हो चली हैं और भारत की जाति-व्यवस्था के बारे में अपनी उदासीनता का घातक प्रायश्चित कर रही हैं।
यह अच्छी बात है कि उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी ने आरक्षण की अंधाधुंध नीतियों से अलग हट कर थोड़ा ठहर कर सोचना शुरू किया है। अगर वह अपने इस सोच में वर्गीय असमानता को शामिल करती है और पूंजीवादी नीतियों का विकल्प तलाशने की कोशिश करती है तो लोहिया के विचारों का सम्मान बढ़ाएगी।
उसकी यह पहल तब और महत्त्वपूर्ण हो सकती है जब वह असमानता और प्राकृतिक संसाधनों की लूट को बढ़ाने वाली यूपीए सरकार की नीतियों से अलग उन ताकतों की खोज करे जो विकल्प की तलाश में लगी हैं। उन ताकतों से मिल कर वह एक नए मोर्चे की तरफ जा सकती है और एक नई संभावना पैदा कर सकती है। पर यह सब तभी संभव है जब वह समाजवाद को आरक्षण की फिसलन भरी राह से बाहर निकाल कर समझ और संघर्ष की नई और ठोस जमीन देना चाहे।

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