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दलित की रोटी खाकर कुत्ता हुआ अछूत

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दलित की रोटी खाकर कुत्ता हुआ अछूत

Post by KULDEEP BIRWAL on Mon May 02, 2011 10:52 pm

‘दलित की रोटी खाकर कुत्ता हुआ अछूत’। पिछले दिनों मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के मलिकपुर गांव की यह घटना समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़ी। मन बहुत आहत हुआ कि आखिर आज भी कुछ लोग न जाने किस समाज, कौन सी सभ्यता में जी रहे हैं।

एक ओर तो हम उन भगवान राम को मानते हैं जिन्होंने शबरी के झूठे बेरों को बड़े चाव से खाया था।

भगवान वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को हम रोज बड़ी श्रद्धा के साथ पढ़ते है। उस भारतवर्ष में निवास करते हैं जिस को अंग्रेजों से आजाद कराने वाले महात्मा गांधी ने दलितों की बस्तियों में जा कर उन के साथ खाया पिया, दिन और रातें गुजारी। इन की पत्नी मां कस्तूरबा ने गुजरात के साबरमती आश्रम में लैटरीन साफ की और बापू ने उन्ही हाथों की परोसी रोटियां खाई।

हाल ही में कांग्रेस महासचिव और दुनियां के सब से अमीर लोगों में शुमार माइक्रोसाफ्ट के चेयरमैन बिल गेटस अमेठी के शाहगढ़ में राहुल के संग जमीन पर दरी बिछा कर दलितों के संग चैपाल लगाकर बैठे। राहुल और बिल गेट्स ने दलितों और गरीब लोगों के चूल्हे पर बनी कच्ची पक्की रोटियां दलितों के साथ झोंपड़ियों में नीचे जमीन फूस पत्ती पर बैठ कर खाई।

दरअसल यह मामला जन सुनवाई में लोगों के सामने तब आया जब एक दलित परिवार चंबल के कलक्टर और डीआईजी के यहां एक काले रंग के शेरू नाम के कुत्ते को लेकर पहंुचा। इस पीड़ित परिवार ने जब अपनी व्यथा सुनाई तो चंबल के कलेक्टर और डीआईजी के होश उड़ गये।

पीड़ित परिवार ने उन्हंे बताया कि उन के पड़ोस में एक यादव परिवार रहता है। हम लोग साहब दलित हैं। एक दिन घर में बची एक रोटी मानवता के नाते हमने अपने पड़ोस में रहने वाले यादव परिवार के पालतू कुत्ते को डाल दी जिसे कुत्ते ने खा लिया।

हमारी इस बात से कुत्ता स्वामी नाराज हो गया और कहने लगा कि तुमने मेरे कुत्ते को अपने घर की रोटी खिला कर अछूत कर दिया। अब इस कुत्ते को अपने घर ले जाओ और इस के बदले मुझे पन्द्रह हजार रूपये कुत्ते की कीमत अदा करो नहीं तो मैं तुम्हें जान से मार दूंगा। पीड़ित दलित परिवार के घर यादव जाति का यह शख्स अपने पालतू कुत्ते को भी बांध गया जिसे यह दलित परिवार अपने साथ लिये था।

कलक्टर और डीआईजी ने पीड़ित दलित परिवार की व्यथा सुनकर तुरन्त पुलिस को कार्यवाही के निर्देश दे दिये पर यह पूरी घटना स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा ज्योतिबा फुले, राजा राम मोहन राय, मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी के स्वच्छ समाज में एक ऐसी आग लगा गई, एक लम्बी बहस का मुद्दा छोड़ गई, इंसान और इंसानियत के मुंह पर बहुत जोर का तमाचा मार गई जिस का जख्म और चोट मानवता और इन्सानियत के जिस्म पर बरसों दिखाई और सुनाई देगा।

इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आज भी हमारे देश में दलित बदहाली और छुआछूत के श्राप से मुक्त नहीं हो पाया है। हमारे देश में आज भी कट्टरपंथी लोग तरह तरह से इन का शोषण कर रहे हैं। रूढ़िवाद, अंधविश्वास, छुआछूत ने हमारे देश और समाज को खोखला कर के रख दिया है।

हमारे जनप्रतिनिधि संसद भवन और विधान सभाओं में बड़े बड़े वादे और दावे करते हैं। दलितों के नाम की राजनीति कर मंत्राी पद और मुख्यमंत्राी पद पाने में कामयाब हो जाते हैं पर इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि आजादी के 64 साल बाद भी एक दलित के मुकाबले कुछ धार्मिक कट्टरपंथियांे की निगाह में एक कुत्ता ज्यादा पवित्रा है।

इस पूरी घटना पर हमारे देश के बुद्विजीवी और सामाजिक संगठन खामोश हैं। क्यों ? आखिर क्या इस घटना पर हमारे समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। यकीनन इस पूरी घटना से आज स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा ज्योतिबा फुले, राजा राममोहन राय, मदन मोहन मालवीय, महात्मा गाँधी, जैसे देश के महान समाज सुधारकों की आत्माएं बहुत दुखी हुई होंगी।

सब से पहले मैं उस यादव परिवार से यह पूछना चाहंूगा कि आखिर आज वे कौन सी सदी में जी रहे हैं। मेरा दूसरा सवाल यह है कि दलित परिवार की रोटी अछूत कैसे हो गई क्योंकि आटा बाजार से आया, पानी तालाब या सरकारी हैण्डपम्प का होगा। क्या उस गरीब के छूने भर से आटे और पानी से बनी रोटी अछूत हो गई।

चलो, यादव परिवार की सोच से सोचकर मान भी लेते हैं कि वो रोटी अछूत हो गई पर जिन रूपयों की मांग यादव परिवार के मुखिया ने दलित परिवार से की है, क्या वो अछूत नहीं होगें क्योंकि उन रूपयों को तो न जाने कितनी बार इस दलित परिवार ने अपने हाथों में लिया होगा। भगवान का शुक्र अदा करने के लिये हो सकता है चूमा भी हो, अपनी जेब में भी रखा होगा। तब क्या यह पैसा अछूत नहीं होगा।

क्या यादव परिवार के मुखिया ने यह भी सोचा है कि जिस प्रकार दलित के घर की एक रोटी खाने के कारण वह अपने पालतू कुत्ते को दलित के घर छोड़ आया, यदि उसने दलित परिवार के हाथों से रूपये लेकर अपने जेब में रख लिये तो क्या वो अछूत नहीं होगा और उस के दिये संस्कारों में पले बढ़े उस के बच्चों ने अगर उसे उस के कुत्ते की तरह अछूत होने पर दलित परिवार के हवाले कर दिया तो क्या होगा।

दरअसल पैसा किसी भी सदी में अछूत नहीं रहा। पैसा इन्सान का सब से बड़ा भगवान है। इस पर गरीब और दलित का चाहे कितना ही खून पसीना लगा हो, बड़े से बड़ा पंडित, बड़े से बड़ा कट्टरपंथी इंसानों में फर्क करने वाला इस पैसे को पूजता है। बिना किसी भेदभाव के मंदिर का पुजारी दलित के हाथ से पैसा लेकर भगवान के चरणों में तुरन्त रख देता है। वो दलित के पैसे और सवर्ण जाति के लोगों के पैसों को अलग अलग नही रखता। कोई कोई मंदिर का पुजारी तो लोगों की नजर बचते ही उस पैसे को चुपचाप अपनी अंटी में भी दबा लेता है। हम इन्सान, इंसानों की बनाई रोटी में फर्क कर सकते हैं पर पैसे में फर्क नहीं कर सकते।

आज हमारे देश की यह कैसी विडम्बना है कि एक कुत्ते के मुकाबले इंसान को हीन भावना से देखा जा रहा है। भगवान ने जिस इंसान के लिये पूरी दुनियां बनाई, आज वो इंसान जानवर से भी गया गुजरा हो गया, तुच्छ हो गया, अछूत हो गया, केवल इसलिये कि उसने छोटी जाति में जन्म लिया। दलित बना कर उसे मन्दिरों में जाने की इजाजत नही दी जाती। कदम कदम पर उस का शोषण कर उपहास उड़ाया जाता है।

आज इस कलयुग में पापी पाखंड रचा कर धर्मात्मा और पुण्यभागी समझे जाने लगे हैं। दलित देश और समाज के लिये खेत खलिहानों में, बड़े बड़े कल कारखानों में, देश की उन्नति में अपना योगदान देने, अपना खून पसीना बहाने के बाद भी कुछ लोगों की निगाहों में आज भी अछूत ही हैं।

क्या इस का जवाब कोई राजनेता आज दे सकता है? शायद नहीं क्योंकि उसने तो अभी सिर्फ दलितों के वोटों के बारे में सोचा है। दलितो के बारे में सोचने का उसे अभी वक्त ही नहीं मिला।

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