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झलकारी बाई (झाँसी की वीरांगना )

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झलकारी बाई (झाँसी की वीरांगना )

Post by KULDEEP BIRWAL on Sun May 01, 2011 5:19 pm

झलकारी बाई (२२ नवंबर १८३० - ४ अप्रैल १८५७) झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में, महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापति थीं।[१] वे लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थीं इस कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वे रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं। अपने अंतिम समय में भी वे रानी के वेश में युद्ध करते हुए वे अंग्रेज़ों के हाथों पकड़ी गयीं और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। उन्होंने प्रथम स्वाधीनता संग्राम में झाँसी की रानी के साथ ब्रिटिश सेना के विरुद्ध अद्भुत वीरता से लड़ते हुए ब्रिटिश सेना के कई हमलों को विफल किया था। यदि लक्ष्मीबाई के सेनानायकों में से एक ने उनके साथ विश्वासघात न किया होता तो झांसी का किला ब्रिटिश सेना के लिए प्राय: अभेद्य था। झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जा सकती है। भारत सरकार ने २२ जुलाई २००१ में झलकारी बाई के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया है,[२] उनकी प्रतिमा और एक स्मारक अजमेर, राजस्थान में निर्माणाधीन है, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उनकी एक प्रतिमा आगरा में स्थापित की गयी है, साथ ही उनके नाम से लखनऊ मे एक धर्मार्थ चिकित्सालय भी शुरु किया गया है।

प्रारंभिक जीवन

झलकारी बाई का जन्म बुंदेलखंड के एक गाँव में एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था। झलकारी बचपन से ही बहुत साहसी और दृढ़ प्रतिज्ञ बालिका थी। झलकारी घर के काम के अलावा पशुओं के रखरखाव और जंगल से लकड़ी इकट्ठा करने का काम भी करती थी। एक बार जंगल में उसकी मुठभेड़ एक बाघ के साथ हो गयी थी, और झलकारी ने अपनी कुल्हाड़ी से उस जानवर को मार डाला था। एक अन्य अवसर पर जब डकैतों के एक गिरोह ने गाँव के एक व्यवसायी पर हमला किया तब झलकारी ने अपनी बहादुरी से उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया था।[३] उसकी इस बहादुरी से खुश होकर गाँव वालों ने उसका विवाह रानी लक्ष्मीबाई की सेना के एक सैनिक पूरन कोरी से करवा दिया, पूरन भी बहुत बहादुर था, और पूरी सेना उसकी बहादुरी का लोहा मानती थी। एक बार गौरी पूजा के अवसर पर झलकारी गाँव की अन्य महिलाओं के साथ महारानी को सम्मान देने झाँसी के किले मे गयीं, वहाँ रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गयी क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं थीं (दोनो के रूप में आलौकिक समानता थी)। अन्य औरतों से झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनकर रानी लक्ष्मीबाई बहुत प्रभावित हुईं। रानी ने झलकारी को दुर्गा सेना में शामिल करने का आदेश दिया। झलकारी ने यहाँ अन्य महिलाओं के साथ बंदूक चलाना, तोप चलाना और तलवारबाजी की प्रशिक्षण लिया। यह वह समय था जब झांसी की सेना को किसी भी ब्रिटिश दुस्साहस का सामना करने के लिए मजबूत बनाया जा रहा था।


स्वाधीनता संग्राम में भूमिका

लार्ड डलहौजी की राज्य हड़पने की नीति के चलते, ब्रिटिशों ने निःसंतान लक्ष्मीबाई को उनका उत्तराधिकारी गोद लेने की अनुमति नहीं दी, क्योंकि वे ऐसा करके राज्य को अपने नियंत्रण में लाना चाहते थे। हालांकि, ब्रिटिश की इस कार्रवाई के विरोध में रानी के सारी सेना, उसके सेनानायक और झांसी के लोग रानी के साथ लामबंद हो गये और उन्होने आत्मसमर्पण करने के बजाय ब्रिटिशों के खिलाफ हथियार उठाने का संकल्प लिया। अप्रैल १८५८ के दौरान, लक्ष्मीबाई ने झांसी के किले के भीतर से, अपनी सेना का नेतृत्व किया और ब्रिटिश और उनके स्थानीय सहयोगियों द्वारा किये कई हमलों को नाकाम कर दिया। रानी के सेनानायकों में से एक दूल्हेराव ने उसे धोखा दिया और किले का एक संरक्षित द्वार ब्रिटिश सेना के लिए खोल दिया। जब किले का पतन निश्चित हो गया तो रानी के सेनापतियों और झलकारी बाई ने उन्हें कुछ सैनिकों के साथ किला छोड़कर भागने की सलाह दी। रानी अपने घोड़े पर बैठ अपने कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ झांसी से दूर निकल गईं।

झलकारी बाई का पति पूरन किले की रक्षा करते हुए शहीद हो गया लेकिन झलकारी ने बजाय अपने पति की मृत्यु का शोक मनाने के, ब्रिटिशों को धोखा देने की एक योजना बनाई। झलकारी ने लक्ष्मीबाई की तरह कपड़े पहने और झांसी की सेना की कमान अपने हाथ मे ले ली। जिसके बाद वह किले के बाहर निकल ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज़ के शिविर मे उससे मिलने पहँची। ब्रिटिश शिविर में पहँचने पर उसने चिल्लाकर कहा कि वो जनरल ह्यूग रोज़ से मिलना चाहती है। रोज़ और उसके सैनिक प्रसन्न थे कि न सिर्फ उन्होने झांसी पर कब्जा कर लिया है बल्कि जीवित रानी भी उनके कब्ज़े में है। जनरल ह्यूग रोज़ जो उसे रानी ही समझ रहा था, ने झलकारी बाई से पूछा कि उसके साथ क्या किया जाना चाहिए? तो उसने दृढ़ता के साथ कहा,मुझे फाँसी दो। जनरल ह्यूग रोज़ झलकारी का साहस और उसकी नेतृत्व क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ, और झलकारी बाई को रिहा कर दिया गया. इसके विपरीत कुछ इतिहासकार मानते हैं कि झलकारी इस युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुई। एक बुंदेलखंड किंवदंती है कि झलकारी के इस उत्तर से जनरल ह्यूग रोज़ दंग रह गया और उसने कहा कि "यदि भारत की १% महिलायें भी उसके जैसी हो जायें तो ब्रिटिशों को जल्दी ही भारत छोड़ना होगा"।

ऐतिहासिक एवं साहित्यिक उल्लेख

मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा, झलकारी बाई के योगदान को बहुत विस्तार नहीं दिया गया है, लेकिन आधुनिक स्थानीय लेखकों ने उन्हें गुमनामी से उभारा है। अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल (२१-१०-१९९३ से १६-०५-१९९९ तक) और श्री माता प्रसाद ने झलकारी बाई की जीवनी की रचना की है। इसके अलावा चोखेलाल वर्मा ने उनके जीवन पर एक वृहद काव्य लिखा है, मोहनदास नैमिशराय ने उनकी जीवनी को पुस्तकाकार दिया है[४] और भवानी शंकर विषारद ने उनके जीवन परिचय को लिपिबद्ध किया है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने झलकारी की बहादुरी को निम्न प्रकार पंक्तिबद्ध किया है -

जा कर रण में ललकारी थी, वह तो झाँसी की झलकारी थी।
गोरों से लड़ना सिखा गई, है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही
नारी थी।

KULDEEP BIRWAL
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Re: झलकारी बाई (झाँसी की वीरांगना )

Post by KULDEEP BIRWAL on Sun May 01, 2011 8:50 pm

इतिहास जब भी लिखा गया है, राजाओं को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। राजा उस देश का प्रथम पुरुष होता है। इसलिए राजा का स्थान इतिहास में शीर्ष पर होता है। इतिहासकारों, कवियों, लेखकों के द्वारा उनका वर्णन नायक के रूप में किया जाता है। किन्तु द्वितीय लाइन के नायकों का वर्णन कम ही मिलता है। ऐसा नहीं है कि इतिहास ने बिल्कुल ही उन्हें नकारा हो। भगवान राम का जहाँ भी उल्लेख आता है, हनुमान जी को भी उतनी ही श्रद्धा और आदर-भाव से याद किया जाता है।
इसी प्रकार झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में महिलाओं की एक शाखा थी। जिसकी सेनापति वीरांगना झलकारी बाई थीं। बुंदेलखण्ड की प्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान ने केवल महारानी लक्ष्मीबाई का ही गुणगान किया है। उनकी कविता में झलकारी बाई का कहीं नाम नहीं आया है। किन्तु राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने झलकारी की बहादुरी को निम्न प्रकार पंक्तिबद्ध किया है -

जा कर रण में ललकारी थी,
वह तो झाँसी की झलकारी थी ।
गोरों से लडना सिखा गई,
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी ।।


झलकारी बाई एक साधारण कोली परिवार में २२ नवम्बर सन् १८३० को पैदा हुई थी। उनके पिता का नाम सदोवा उर्फ मूलचन्द कोली और माता जमुनाबाई उर्फ धनिया था। झाँसी के भोजला गाँव में उसका जन्म हुआ था। वह पढी-लिखी तो थी नहीं। घर के काम काज में हाथ बँटाना, पशुओं की देखभाल करना, खाना बनाने के लिए जंगल से लकडी काटकर लाना उसका नित्य कार्य था। गाँव वालों एवं माता-पिता को उनकी बहादुरी का उस समय पता चला जब वह अपने साथियों के साथ जंगल में लकडी काटने गई थी। अचानक झाडयों से निकल कर एक आदमखोर चीते ने झलकारी पर आक्रमण कर दिया।
चीते के अचानक हमले को देखकर उसके संगी साथी सभी भाग खडे हुए, किन्तु झलकारी ने हिम्मत न हारी और वह कुल्हाडी लेकर चीते से भिड गई। चीते ने अपने पंजों से झलकारी को घायल कर दिया। लेकिन झलकारी ने कुल्हाडी से चीते के माथे पर सधा हुआ वार किया। चीता इस वार की मार को सहन न कर सका तथा निढाल हो कर गिर पडा। इस प्रकार झलकारी बाई की बहादुरी की कहानियाँ झाँसी रियासत के दरबार में पहुँचने लगीं।
झलकारी बाई का विवाह पूरन कोली नामक वीर युवक के साथ हुआ। वह भी झाँसी की सेना में सिपाही था। पूरे गाँव वालों ने झलकारी बाई के विवाह में भरपूर सहयोग दिया। वह पूरन के साथ झाँसी आ गई। सन् १८५७ में झाँसी पर युद्ध के बादल मंडराने लगे थे। अंग्रेजों ने झाँसी को विक्टोरिया के झंडे के नीचे लाने के कई प्रयास किए। इस दौरान एक दिन झलकारी गौरी पूरज के अवसर पर झाँसी के किले में रानी का आशीर्वाद लेने गई। रानी इस कोली बाला की कद काठी को देखकर काफी प्रभावित हुई। रानी को झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनाए गये तो उन्होंने दुर्गादल जो कि सेना की महिला शाखा थी, उसमें भर्ती कर लिया। आगे चलकर झलकारी बाई दुर्गादल की सेनापति बनाई गई।
झलकारी को तो जैसे मन की मुराद मिल गई। उन्हें बंदूक चलाना और तोपों का प्रशिक्षण दिया गया। झलकारी इन सब में सर्वश्रेष्ठ थी। अंग्रेजों ने रानी के दत्तक पुत्र को रियासत का वारिस मानने से इन्कार कर दिया और झाँसी को अपने अधीन करने के कुचक्र चलाने प्रारम्भ कर दिए। स्थिति की गंभीरता को भाँप कर सेनानायक, झाँसी की जनता, रानी के साथ लामबन्द हो गए। झाँसी अंग्रेजों को थाली में रखकर सौंपने के बजाय उनसे लोहा लेने का निर्णय लिया गया।
महारानी लक्ष्मीबाई ने कुशलता से युद्ध संचालन किया। अंग्रेजों एवं उनके देशी पिट्ठुओं को कई बार शिकस्त दी। पूरन कोली को किले के एक द्वार की रक्षा करने का दायित्व सौंपा गया। झलकारी बाई रानी की मुख्य सहयोगी की भूमिका में थी। कहा जाता है भारत में जयचंदों की किसी भी काल में कमी नहीं रही है। झाँसी के एक सेनानायक दूल्हेराव ने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया। युद्ध के निर्णायक दौर में इस विश्वासघाती ने किले का एक द्वार खोल दिया। फलस्वरूप अंग्रेजी सेना किले में प्रवेश कर गयी। किले का पतन होते ही सेनानायकों एवं झलकारी बाई ने रानी को सलाह दी कि वह कुछ विश्वस्त सैनिकों के साथ किले के बाहर निकल जायें।
रानी ने अपने बच्चे को पीठ पर बाँध लिया। घोडे पर सवार होकर गुप्त-मार्ग से किले से बाहर हो गई। पूरन कोली उस दुर्ग की रक्षा करते हुए बुरी तरह घायल हो गया। झलकारी बाई जो अब रानी की भूमिका में युद्ध कर रही थी, पति के घायल होने की सूचना पाकर विचलित नहीं हुई। उसने साहस तथा धैर्य से शत्रु का सामना किया।
रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों की पहुँच से दूर हो जाना चाहती थी। किले में युद्ध की कमान सँभाले झलकारी बाई रानी के वेश में अंग्रेजी सेना पर शेरनी की तरह टूट पडी। झलकारी ने १२ घंटे तक अनवरत युद्ध किया और अंग्रेज यही समझते रहे कि उनसे रानी ही युद्ध कर रही है। यकायक झाँसी की सेना पस्त होने लगी। झलकारी को शत्रु ने चारों ओर से घेर लिया और बंदी बना लिया। उसे जनरल ह्यूरोज के समक्ष प्रस्तुत किया गया। वहाँ झाँसी के एक गद्दार ने पहचान लिया। उसने अंग्रेजों को बता दिया कि यह रानी लक्ष्मीबाई नहीं बल्कि उनकी दुर्गा दल की नायिका झलकारी बाई है। जनरल ह्यूरोज जाँबाजों का सम्मान करता था, वह उनसे बहुत प्रभावित हुआ। झलकारी की वीरता तथा त्याग की प्रशंसा करते हुए उसने कहा - �अगर भारत में स्वतंत्रता की दीवानी ऐसी दो चार महिलाएँ और हो जायें तो अब तक बर्तानियों ने भारत में जो ग्रहण किया है, वह उन्हें छोडना पडेगा। भारत को स्वतंत्र होने से कोई भी नहीं रोक सकता।�
झलकारी बाई का अन्त किस प्रकार हुआ, इस बारे में इतिहासकार मौन हैं। कुछ लोगों का कहना है कि उन्हें अंग्रेजों द्वारा फाँसी दे दी गई। लेकिन कुछ का कहना है कि उनका अंग्रेजों की कैद में जीवन समाप्त हुआ। अखिल भारतीय युवा कोली राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नरेशचन्द्र कोली के अनुसार ४ अप्रैल १८५७ को झलकारी बाई ने वीरगति प्राप्त की। तत्कालीन इतिहासकारों ने लम्बे समय तक झलकारी बाई के योगदान को नजरअन्दाज किया, किन्तु बुन्देलखण्ड के अनेक लेखकों ने उनकी शौर्य गाथा गाई हैं। जिनमें चोखेलाल ने उनके जीवन पर एक वृहद् काव्य लिखा है और भवानी शंकर विशारद ने उनके जीवन परिचय को लिपिबद्ध किया है। झाँसी की रानी का इतिहास जब-जब लोगों के द्वारा पढा जायगा, झलकारी बाई के योगदान को लोग अवश्य याद करेंगे। इस श्ाृंखला में उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में उनकी घोडे पर सवार मूर्ति स्थापित की गई है। लखनऊ में उनके नाम पर धर्मार्थ चिकित्सालय प्रारम्भ किया गया है। जिससे भविष्य की भारतीय समाज की अनेक पीढयाँ उनसे देश धर्म पर मर मिट जाने की प्रेरणा लेत
ी रहेंगी।

KULDEEP BIRWAL
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Re: झलकारी बाई (झाँसी की वीरांगना )

Post by KULDEEP BIRWAL on Sun May 01, 2011 8:51 pm

बांदा बुन्देलखण्ड झांसी १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम और बाद के स्वतन्त्रता आन्दोलनों में देश के अनेक वीरो और वीरांगनाओं ने अपनी कु र्बानी दी है। देश की आजादी के लिए शहीद होने वाले ऐसे अनेक वीरो और वीरांगनाओं का नाम तो स्वर्णक्षरों में अकित है किन्तु बहुत से ऐसे वीर और वीरांगनाये है जिनका नाम इतिहास में दर्ज नहीं है। तो बहुत से ऐसे भी वीर और वीरांगनाएं है जो इतिहास कारों की नजर में तो नहीं आ पाये जिससे वे इतिहास के स्वार्णिम पृष्टों में तो दर्ज होने से वंचित रह गये किन्तु उन्हें लोक मान्यता इतनी अधिक मिली कि उनकी शहादत बहुत दिनों तक गुमनाम नहीं रह सकी । ऐसे अनेक वीरो और वीरांगनाओं का स्वतन्त्रता संग्राम में दिया गया योगदान धीरे - धीरे समाज के सामने आ रहा है। और अपने शासक झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के प्राण बचाने के लिए स्वयं वीरांगना बलिदान हो जाने वाली वीरांगना झलकारी बाई ऐसी ही एक अमर शहीद वीरांगना है जिनके योगदान को जानकार लोग बहुत दिन बाद रेखाकित क र पाये है। झलकारी जैसे हजारों बलिदानी अब भी गुमनामी के अधेरे में खोये है जिनकी खोजकर स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की भी वृद्धि करने की पहली आवश्यकता है। वीरांगना झलकारी बाई झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की सेना में महिला सेना की सेनापति थी जिसकी शक्ल रानी लक्ष्मी बाई से हुबहू मिलती थी। झलकारी के पति पूरनलाल रानी झांसी की सेना में तोपची थे। सन् १८५७ के प्रभम स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेंजी सेना से रानी लक्ष्मीबाई के घिर जाने पर झलकारी बाई ने बड़ी सूझ बुझ स्वामिभक्ति और राष्ट्रीयता का परिचय दिया था। निर्णायक समय में झलकारी बाई ने हम शक्ल होने का फायदा उठाते हुए स्वयं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गयी थी और असली रानी लक्ष्मी बाई को सकुशल झांसी की सीमा से बाहर निकाल दिया था और रानी झांसी के रूप में अग्रेंजी सेना से लड़ते - लड़ते शहीद हो गयी थी।

वीरांगना झलकारी बाई के इस प्रकार झांसी की रानी के प्राण बचाने अपनी मातृ भाूमि झांसी और राष्ट्र की रक्षा के लिए दिये गये बलिदान को स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास भले ही अपनी स्वार्णिम पृष्टों में न समेट सका हो किन्तु झांसी के लोक इतिहासकारो , कवियों , लेखकों , ने वीरांगना झलकारी बाई के स्वतंत्रता संग्राम में दिये गये योगदान को श्रृद्धा के साथ स्वीकार किया है। वीरांगना झलकारी बाई का जन्म २२ नवम्बर १८३० ई० को झांसी के समीप भोजला नामक गांव में एक सामान्य कोरी परिवार में हुआ था जिसके पिता का नाम सदोवा था। सामान्य परिवार में पैदा होने के कारण झलकारी बाई को औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर तो नहीं मिला किन्तु वीरता और साहस झलकारी में बचपन से विद्यमान था। थोड़ी बड़ी होने पर झलकारी की शादी झांसी के पूरनलाल से हो गयी जो रानी लक्ष्मीबाई की सेना में तोपची था। प्रारम्भ में झलकारी बाई विशुद्ध घेरलू महिला थी किन्तु सैनिक पति का उस पर बड़ा प्रभाव पड़ा धीरे - धीरे उसने अपने पति से से सारी सैन्य विद्याएं सीख ली और एक कुशल सैनिक बन गयी। इस बीच झलकारी बाई के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटी जिनमें उसने अपनी वीरता साहस और एक सैनिक की कुशलता का परिचय दिया। इनकी भनक धीरे - धीरे रानी लक्ष्मीबाई को भी मालूम हुई जिसके फलस्वरूप रानी ने उन्हें महिला सेना में शामिल कर लिया और बाद से उसकी वीरता साहस को देखते हुए उसे महिला सेना का सेनापति बना दिया। झांसी के अनेक राजनैतिक घटना क्ररमों के बाद जब रानी लक्ष्मीबाई का अग्रेंजों के विरूद्ध निर्णायक युद्ध हुआ उस समय रानी की ही सेना का एक विश्वासघाती दूल्हा जू अग्रेंजी सेना से मिल गया था और झांसी के किले का ओरछा गेट का फाटक खोल दिया जब अग्रेंजी सेना झांसी के किले में कब्जा करने के लिए घुस पड़ी थी। उस समय रानी लक्ष्मीबाई को अग्रेंजी सेना से घिरता हुआ देख महिला सेना की सेनापति वीरांगना झलकारी बाई ने बलिदान और राष्ट्रभक्ति की अदभुत मिशाल पेश की थी। झलकारी बाई की शक्ल रानी लक्ष्मीबाई से मिलती थी ही उसी सूझ बुझ और रण कौशल का परिचय देते हुए वह स्वयं रानी लक्ष्मीबाई बन गयी और असली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को सकुशल बाहर निकाल दिया और अग्रेंजी सेना से स्वयं संघर्ष करती रही।

बाद में दूल्हा जी के बताने पर पता चला कि यह रानी लक्ष्मी बाई नहीं बल्कि महिला सेना की सेनापति झलकारी बाई है जो अग्रेंजी सेना को धोखा देने के लिए रानी लक्ष्मीबाई बन कर लड़ रही है। बाद में वह शहीद हो गयी। वीरांगना झलकारी बाई के इस बलिदान को बुन्देलखण्ड तो क्या भारत का स्वतन्त्रता संग्राम कभी भुला नहीं सकता। वीरांगना झलकारी बाई का सबसे पहले उल्लेख बुन्देलखण्ड के सुप्रसिद्ध साहित्यिक इतिहासकार वृन्दावन लाल वर्मा ने अपने उपन्यास लक्ष्मी बाई में किया था जिससे बाद में धीरे - धीरे अनेक विद्वानों सहित्यकारों इतिहासकारों ने झलकारी के स्वतन्त्रता संग्राम के योगदान का उदघाटित किया। झलकारी बाई का विस्तृत इतिहास भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण के प्रकाशन विभाग ने झलकारी बाई शीर्षक से ही प्रकाशित किया है। बाद में भारत सरकार के पारेट एण्ड टेलीग्राफ विभाग ने २२ जुलाई २००१ को झलकारी बाई पर डाक टिकट जारी कर उसके योगदान को स्वीकार किया है। झांसी के इतिहास कारों में अधिकतर ने वीरांगना झलकारी बाई को नियमित स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में नहीं सम्मलित किया किन्तु बुन्देली के सुप्रसिद्ध गीतकार महाकवि अवधेश ने झलकारी बाई शीर्षक से एक नाटक लिखकर वीरांगना झलकारी बाई की ऐतिहासिकता प्रमाणित की है। वीरांगना झलकारी बाई के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में दिये गये योगदान से देश का अधिकतर जन मानस तो परिचित नहीं है किन्तु एक नकारात्मक घटना ने उन्हें जन - जन से परिचित करा दिया है। हुआ यों कि मार्च २०१० में आगरा के दो प्रकाशकों चेतना प्रकाशन और कुमार पाब्लिकेशन ने बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी के पाठय क्ररम के अनुसार प्रकाशित की जिसमें उन्होंने बहु विकल्पीय प्रश्नों में वीरांगना झलकारी को नर्तकी की श्रेणी में प्रकाशित कर वीरांगना को अपमानित करने का प्रयास किया। इन दोनों प्रकाशनों का राजनैतिक व्यक्तियों , सामाजिक संगठनों बुद्धजीवियों साहित्यकारों , पत्रकारों ने कड़ा विरोध किया और वीरांगना झलकारी बाई के वास्तविक चरित्र से परिचित कराया।

जालौन के सांसद घनश्याम अनुरागी ने झांसी के मण्डलायुक्त टी०पी० पाठक के आदेश पर प्रकाशक के विरूद्ध में एक अभियोग भी पंजीकृत कराया। बुन्देलखण्ड के झांसी , जालौन , ललितपुर , महोबा , बांदा , चित्रकूट , छतरपुर , टीकमगढ़ , दतिया आदि सभी जिलों में धरना प्रदर्शन जुलूस निकालने प्रकाशक का पुतला फूंकने से लेकर बुद्धजीवी वर्ग में जबरजस्त प्रतिक्ररिया हुई। प्रकाशक के विरोध में समाचार पत्रों में तो लगभग एक माह तक प्रतिक्ररियाएं आती रही। प्रकाशक के विरोध में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से व्यक्त किये गये आक्ररोश से स्वयं सिद्ध हो गया कि राष्ट्र के लिए त्याग और बलिदान की मिशाल पेश करने वाली वीरांगना को नर्तकी की श्रेणी में रखना के वल वीरांगना झलकारी बाई का ही अपमान नहीं था बल्कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और देश की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले शहीदों का घोर अपमान था लोगों का गुस्सा तब शान्त हुआ जब झांसी के मण्डलायुक्त के आदेश पर प्रकाशक के विरूद्ध मुकदमा पंजीकृत हो गया। वीरांगना झलकारी बाई के बारे में इस प्रकार क ा अपमान जनक टिप्पणी प्रकाशित करने के पहले भले ही आम जनमानस उनके योगदान को न जानती रही हो किन्तु उस समय से समाज के सजग पाठक अवश्य परिचित हो गये है। त्याग और बलिदान की ऐसी मिशाल देश करने वाली वीरांगना झलकारी बाई को अनेक जन्म दिवस के अवसर पर विनम्र श्रद
्धान्जलि।

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Re: झलकारी बाई (झाँसी की वीरांगना )

Post by KULDEEP BIRWAL on Sun May 01, 2011 8:52 pm


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